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Wednesday, December 26, 2012

मुक्ति की चाह (कविता) 3


1

मन भटका
जंगली सोचें जन्मी
राह मिले न

2
खोजे मानव
दानव छिपा हुआ
देव दिखे न

3

बँधी सीमाएँ
साँसें घुटती जाती
मुक्ति की चाह