त्रिपदम 'सकूरा'
'सकूरा' वृक्ष/ मोहक रूप रंग/ त्रिपदम सा !
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Sunday, May 15, 2016
प्यार की डली - माँ (2)
मीठी -सी माँ है
लोरी मिश्री सी घुली
प्यार की डली
*********
माँ की बिटिया
प्यार दुलार पाया
सबल हुई ।
Tuesday, July 15, 2014
संघर्षरत जिएँ (8)
प्रेम सत्य है
रूप रंग सुगन्ध
त्रिपदम सा
निशा स्तब्ध थी
सागर सम्मोहित
लहरें गातीं
धरा ठिठकी
लहरों में उद्वेग
चंदा निहारे
सुर कन्या सी
आलिंगनबद्ध थीं
लहरें प्यारी
रेतीला मन
फिसलते कदम
दिशाहीनता
शीत बसंती
बदलती ऋतुएँ
झरता ताप
गरजे मेघ
दामिनी दमकती
सूरज भागा
जीवन-चक्र
संघर्षरत जिएँ
आत्म-शक्ति हो
जादू से भरे हाथ (2)
कॉफी का प्याला
कागज़ कलम है
शब्दों की झाग
प्राण फूँकते
जादू से भरे हाथ
संजीवनी से
सुरमई मेघ हैं (2)
सलोना नभ
सुरमई मेघ हैं
साँवली घटा
तूफानी रात
तड़ित दामिनी सी
भयभीत मैं
गर्व किस बात का (5)
क्यों मैं ही मैं हूँ
गर्व किस बात का
नासमझी क्यों
अहम त्यागो
अमर तुम नहीं
मृत्यु निश्चित
घना अंधेरा
छाया का साया नहीं
अविश्वास है
मृत्यु मित्र सी
चुपके से आती है
गले लगाती
यायावरी है
आना-जाना लोगों का
थके न कोई
अक्स में दिल मेरा (9)
गौर से देखो
अक्स में दिल मेरा
देश में छोड़ा
इतने एसी
कितना प्रदूषण
दिल धड़का
राह चलते
किताबें खरीदीं थी
सस्ती दो तीन
ध्यान में लीन
कबूतर सोच में
मन मोहता
गहरा कुँआ
जल-जीवन भरा
मन भी वैसा
प्यारे बालक
देश-प्रेम दर्शाएँ
रिपब्लिक डे
रस्ता देखूँ मैं
कोई मीत मिलेगा
आशा थी बस
देखे किसको
कागा पीठ दिखाए
गीत सुनाए
मीत को पाया
वट-वृक्ष का साया
मन भरमाया
(photos clicked by me from hotel window in Mumbai)
मौन की भाषा पढ़ो (2)
मौन हुई मैं
स्नेह करे निशब्द
भाव गहरे
शब्द न पाऊँ
मौन की भाषा पढ़ो
आभारी हूँ मैं
साया मन को भाया (3)
सपना आया
साया मन को भाया
स्नेह की छाया
खड़ी मुस्काये
आज
नहीं तो कल
पाना तुझको
विश्वास
मुझे
जन्मों जन्मों का नाता
मिलना ही है
लो आया ग्रीष्म (5)
लो आया ग्रीष्म
जला, तपा भभका
सन्नाटा छाया
बरसे आग
जले धरा की देह
दहका सूरज
लू का थपेड़ा
थप्पड़ सा लगता
बेहोशी छाती
प्यास बुझे न
जल है प्रेम बूँद
तरसे मन
खुश्क से पत्ते
पैरों तले चीखते
मिटे पल में
ऋतु गर्मी की आई (5)
लू सी जलती
ऋतु गर्मी की आई
धू धू करती
*
किरणें तीली
सूरज की माचिस
धरा सुलगी
*
सड़कें काली
तपती रेत जले
खुश्क हवाएँ
*
दम घुटता
धूल में घर डूबा
दीवारें रोतीं
*
रेतीला साया
दबी चहुँ दिशाएँ
घुटी हवाएँ
गुण औगुण संग (6)
डरा कपोत
बिल्ली टोह में बैठी
जीतेगा एक
**
सोचा मैंने भी
खामोश हूँ क्यों
बैठी जड़ सी
**
क्या मैं ऐसी हूँ
तटस्थ या नादान
भावुक जीव
**
पंछी आज़ाद
आँख कान थे बंद
ध्यान मग्न था
**
मैं-मैं या म्याऊँ
करते प्राणी सब
कौन मूर्ख
**
सभी निराले
गुण औगुण संग
स्वीकारा मैंने
ममता माँ की
उंगलियाँ रचेगीं (3)
चंचल नैन
हर पल उड़ते हैं
पलकें पंख
गुलाबी होंठ
आज़ादी के नग़में
सुरीले सुर
खुतकार सी
उंगलियाँ रचेंगी
तस्वीर नई
(खुतकार=पेंसिल)
धूल है नकचढ़ी (6)
प्याला हो जैसे
रेत में डूबा रवि
आधा भरा सा
धूल के कण
पत्तों पर पसरे
चमकीले से
सिर चढ़ती
धूल है नकचढ़ी
चिड़चिड़ी सी
धूल ही धूल
हवा तूफ़ानी तेज़
दम घुटता
धूसर पेड़
धूल भरी शाखाएँ
पत्तों पे गर्द
नभ ने ओढ़ा
धरती का आँचल
मटमैला सा
स्मृति-दंश (5)
ख़ाली आँखें
रेगिस्तान अपार
वीरानापन
पीछा करते
सपनों के हैं साए
छूना है बस
स्वप्न सलोना
पा लूँगी इक दिन
विश्वास भरा
खुश्बू प्यार की
महकते हैं प्राण
खिला जीवन
स्वर्णिम पल
मिलन अलौकिक
स्मृति-दंश
स्वेद सुरा को चख (2)
छाया रहस्य
धूल से आच्छादित
मौन हैं बुत
साकी सोया सा
स्वेद सुरा को चख
मद की मस्ती
हाइकु समूह के लिए (6)
धरा की माँग
झिलमिलाता व्योम
चाँदी बिखरी
कर कस्तूरी
सखी बन महकी
सूँघें हिरणी
या
नन्हीं के हाथ
कस्तूरी महकती
ढूँढता मृग
झरता स्नेह
तृप्त धरा आकाश
माया मोहती
स्वर्ग का झूला
माँ का आँचल न्यारा
झूलता लाल
बच्चों का मोह
माँ छिपाती डैनों में
जग निष्ठुर
शब्द भेदते (2)
बात औ' भात
जीभ के वशीभूत
विष वमन
शब्द भेदते
तीर बन चुभते
भाव मरते
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