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Sunday, June 22, 2014

आनन्द का सोता सा (4)


दिल को छू ले
बात-बात का फ़र्क

बुद्धि उलझे

शुष्क नीरस

प्रेम-पुष्प विहीन
मानव मन


मृग-तृष्णा है

मन मरुस्थल सा
प्रेम का सोता


 प्रेमी का मन 
आनन्द का झरना

 रस झरता