Tuesday, December 11, 2012

सत्य का खोजी (कविता) 5


मैं मैं नहीं हूँ
जो हूँ वैसी नहीं हूँ
भ्रमित मन

छलिया बन
पाखंड करता है
नादान मन

प्रशंसा पाए
मेरा मैं जो उत्कृष्ट 
तृप्त हो जाए

मोह पाश है
विश्व मकड़ी जाल
उलझे मन 

सत्य का खोजी
प्रकाश स्वयं बन
मार्गदर्शक 

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