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Tuesday, July 15, 2014

संघर्षरत जिएँ (8)


प्रेम सत्य है
रूप रंग सुगन्ध
त्रिपदम सा


निशा स्तब्ध थी
सागर सम्मोहित
लहरें गातीं

धरा ठिठकी
लहरों में उद्वेग
चंदा निहारे

सुर कन्या सी
आलिंगनबद्ध थीं
लहरें प्यारी


रेतीला मन
फिसलते कदम
दिशाहीनता

शीत बसंती
बदलती ऋतुएँ
झरता ताप

गरजे मेघ
दामिनी दमकती
सूरज भागा

        जीवन-चक्र         
संघर्षरत जिएँ
आत्म-शक्ति हो

Sunday, June 22, 2014

प्रकाश स्वयं बन (कविता) 5


मैं मैं नहीं हूँ
जो हूँ वैसी नहीं हूँ
भ्रमित मन

छलिया है जो
पाखंड करता क्यों
नादान मन

प्रशंसा पाए
अहम ही ब्रह्रास्मि
तृप्त हो जाए

मोह पाश है
विश्व मकड़ी जाल
नहीं उलझो

सत्य का खोजी
प्रकाश स्वयं बन
तू ही आनन्दी

Tuesday, December 11, 2012

सत्य का खोजी (कविता) 5


मैं मैं नहीं हूँ
जो हूँ वैसी नहीं हूँ
भ्रमित मन

छलिया बन
पाखंड करता है
नादान मन

प्रशंसा पाए
मेरा मैं जो उत्कृष्ट 
तृप्त हो जाए

मोह पाश है
विश्व मकड़ी जाल
उलझे मन 

सत्य का खोजी
प्रकाश स्वयं बन
मार्गदर्शक