प्रकृति संग
चिंतन में डूबता
अकेला मन
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स्वर्णमयी है
धरा के हस्त धरा
कनक धन
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क्षितिज दूर
गगन धरा जुड़ें
दिवा स्वप्न है
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झीना आँचल
धूल धूसरित सा
धुँधला रूप
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फटा दामन
सूरज निकलता
हाथों से छूटा