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Tuesday, May 17, 2016
Tuesday, July 15, 2014
Wednesday, December 26, 2012
प्रकृति संग (कविता) 5
प्रकृति संग
चिंतन में डूबता
अकेला मन
* * * *
स्वर्णमयी है
धरा के हस्त धरा
कनक धन
* * * *
क्षितिज दूर
गगन धरा जुड़ें
दिवा स्वप्न है
* * * *
झीना आँचल
धूल धूसरित सा
धुँधला रूप
* * * *
फटा दामन
सूरज निकलता
हाथों से छूटा
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