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Sunday, June 22, 2014

खिलने की चाह है (2)


वसुधा सोचे
खिलने की चाह है

शांति मिलेगी

सुमन खिले

हरयाली उमगी
फैली सुगंध  

Thursday, June 13, 2013

त्रिपदम पले हैं फूलों में (16)



 पदम तले
त्रिपदम पले हैं

सुगन्ध भरे




नवयौवना
गुलानारी रूपसी

नई नवेली






न्यारा है रूप
चित्रकला अनोखी

रंगों की माया




बिन्दु चक्र में
सम्मोहन की छाया

भरा रहस्य




बाँहें फैलाए
धरा खड़ी निहारे

नीला आकाश





मैं और तुम
उपवन के माली

फूल खिले हैं





स्नेह के धागे
पीले केसर जैसे

अति सुन्दर





 काँटो का संगी
गुलाब नाज़ुक सा

गुलों का गुल




 धरा सजी है
लाल पीले रंग से 

पत्ते मुस्काए


 गुलाबी गोरी
प्रहरी तने हुए

नाता गहरा




हरा कालीन
टंके हैं बेल-बूटे
बेमोल कला





गुलाबी बाँहें
नभ को छूना चाहें
हँसी दिशाएँ





दहका रवि
हो गए लाल पीले

खिलते फूल





 दृढ़-निश्चयी
जीने का लक्ष्य पाएँ

ठान लो बस


 रंग रंगीला
महकता जीवन

कण्टकहीन




धुंधले साए
छटेंगे इक दिन
खिलेगे फूल