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Tuesday, May 17, 2016

Tuesday, July 15, 2014

अक्स में दिल मेरा (9)


 
गौर से देखो
अक्स में दिल मेरा
देश में छोड़ा





इतने एसी
कितना प्रदूषण
दिल धड़का





राह चलते
किताबें खरीदीं थी
सस्ती दो तीन





ध्यान में लीन
कबूतर सोच में

मन मोहता




गहरा कुँआ
जल-जीवन भरा

मन भी वैसा




प्यारे बालक
देश-प्रेम दर्शाएँ
रिपब्लिक डे





रस्ता देखूँ मैं
कोई मीत मिलेगा
आशा थी बस




देखे किसको
कागा पीठ दिखाए
गीत सुनाए




 मीत को पाया
वट-वृक्ष का साया

मन भरमाया


(photos clicked by me from hotel window in Mumbai) 



साया मन को भाया (3)



सपना आया

साया मन को भाया
स्नेह की छाया



खड़ी मुस्काये
आज नहीं तो कल
पाना तुझको



विश्वास मुझे 
जन्मों जन्मों का नाता
मिलना ही है

जल बिन मानव (2)





जीवन जले

जल बिन मानव
कैसे जिएगा ?







बहता जल

जल से जीवन है
कीमत जानो


आग़ोश में सुक़ून






सिहरी काँपीं
आगोश मे सकून
सूरज तापे



(दमाम में 8-10 क्लिक करने के बाद ही मेरी मन-चाही मन-भावन तस्वीर उतर पाई)

मॉल देहरान का (6)


देखा हमने
मॉल देहरान का
नया नवेला



बुर्के में बंद
ख्वाहिशे हैं हज़ार
पूरी हों अब



 सला का वक्त
पर्दे में गपशप
दुकाने बंद




दोस्त मिले दो
दम लेने को बैठे
कॉफी थे पीते






 फैलती खुश्बू

सिनामन के रोल्ज़

मुँह में पानी





पल दो पल

बातों में मशगूल

पिता औ' पुत्र


ऋतु गर्मी की आई (5)



लू सी जलती
ऋतु गर्मी की आई
धू धू करती
*
किरणें तीली
सूरज की माचिस
धरा सुलगी
*
सड़कें काली
तपती रेत जले
खुश्क हवाएँ
*
दम घुटता
धूल में घर डूबा
दीवारें रोतीं
*
रेतीला साया
दबी चहुँ दिशाएँ
घुटी हवाएँ

गुण औगुण संग (6)




डरा कपोत
बिल्ली टोह में बैठी
जीतेगा एक 
**
सोचा मैंने भी
खामोश हूँ क्यों
बैठी जड़ सी
**
क्या मैं ऐसी हूँ
तटस्थ या नादान
भावुक जीव
**
पंछी आज़ाद
आँख कान थे बंद
ध्यान मग्न था
**
मैं-मैं या म्याऊँ
करते प्राणी सब
कौन मूर्ख
**
सभी निराले
गुण औगुण संग
स्वीकारा मैंने

ममता माँ की


उंगलियाँ रचेगीं (3)




चंचल  नैन
हर पल उड़ते हैं
पलकें पंख 

गुलाबी होंठ 
आज़ादी के नग़में
सुरीले सुर

खुतकार सी
उंगलियाँ रचेंगी
तस्वीर नई

(खुतकार=पेंसिल)

स्मृति-दंश (5)




ख़ाली आँखें
रेगिस्तान अपार
वीरानापन

पीछा करते
सपनों के हैं साए
छूना है बस

स्वप्न सलोना
पा लूँगी इक दिन
विश्वास भरा

खुश्बू प्यार की
महकते हैं प्राण
खिला जीवन

स्वर्णिम पल
मिलन अलौकिक
स्मृति-दंश

जीवन धुआँ



जीवन धुआँ 
साँसो को पीते जाते

उड़ती उम्र

बादल छल्ले



हुक्का आकाश 
कश खींचे धरती 

बादल छल्ले

Sunday, June 22, 2014

मौत अंगूरी न्यारी (2)




साकी सा यम
मौत अंगूरी न्यारी
रूप खिलेगा/नशा चढ़ेगा/मोक्ष मिलेगा

मुत्यु प्रिया सी
इक दिन आएगी
गले लगाओ

कोहरा गूँगा (2)




वीरान पथ
निपट अकेली मैं
कोहरा गूँगा 

नीले सपने
रजनी भेदभरी
 सोई है धरा 


निपट अकेली वो (माँ) 13



कैसे लिखूँ मैं
बुद्धि जड़ हो गई

मन बोझिल

सोचा था मैंने
सफ़रनामा न्यारा

दर्ज करूँगी

लेखनी रुकी
थम गए हैं शब्द

गला रुँधा है


कविता हो न

लेख लिख न पाऊँ
बात बने न



अर्धांग रूठा

निपट अकेली वो 
दर्द गहरा


साथी जो छूटा
मन-पंछी व्याकुल

रोता ही जाए

समझूँ कैसे
अंतर्मन की पीड़ा 
छटपटाऊँ

सरल नहीं
लिख पाना कुछ भी

हाल बेहाल

देखा जो मैंने
मैना जब चहकी

मन बहला

माँ ने भी देखा
ठंडी सी आह भरी

नैनों में नीर

पंछी से सीखो
कर्म करो अपना
मोह न जानो

उड़ जाते हैं
चींचीं करते बच्चे

पाते ही पंख 

यादों के साए
खुश्बू बनके छाएँ

इच्छा सबल 

Thursday, June 13, 2013

त्रिपदम पले हैं फूलों में (16)



 पदम तले
त्रिपदम पले हैं

सुगन्ध भरे




नवयौवना
गुलानारी रूपसी

नई नवेली






न्यारा है रूप
चित्रकला अनोखी

रंगों की माया




बिन्दु चक्र में
सम्मोहन की छाया

भरा रहस्य




बाँहें फैलाए
धरा खड़ी निहारे

नीला आकाश





मैं और तुम
उपवन के माली

फूल खिले हैं





स्नेह के धागे
पीले केसर जैसे

अति सुन्दर





 काँटो का संगी
गुलाब नाज़ुक सा

गुलों का गुल




 धरा सजी है
लाल पीले रंग से 

पत्ते मुस्काए


 गुलाबी गोरी
प्रहरी तने हुए

नाता गहरा




हरा कालीन
टंके हैं बेल-बूटे
बेमोल कला





गुलाबी बाँहें
नभ को छूना चाहें
हँसी दिशाएँ





दहका रवि
हो गए लाल पीले

खिलते फूल





 दृढ़-निश्चयी
जीने का लक्ष्य पाएँ

ठान लो बस


 रंग रंगीला
महकता जीवन

कण्टकहीन




धुंधले साए
छटेंगे इक दिन
खिलेगे फूल