मैं मैं नहीं हूँ
जो हूँ वैसी नहीं हूँ
भ्रमित मन
छलिया है जो
पाखंड करता क्यों
नादान मन
प्रशंसा पाए
अहम ही ब्रह्रास्मि
तृप्त हो जाए
मोह पाश है
विश्व मकड़ी जाल
नहीं उलझो
सत्य का खोजी
प्रकाश स्वयं बन
तू ही आनन्दी
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