Sunday, June 22, 2014

निपट अकेली वो (माँ) 13



कैसे लिखूँ मैं
बुद्धि जड़ हो गई

मन बोझिल

सोचा था मैंने
सफ़रनामा न्यारा

दर्ज करूँगी

लेखनी रुकी
थम गए हैं शब्द

गला रुँधा है


कविता हो न

लेख लिख न पाऊँ
बात बने न



अर्धांग रूठा

निपट अकेली वो 
दर्द गहरा


साथी जो छूटा
मन-पंछी व्याकुल

रोता ही जाए

समझूँ कैसे
अंतर्मन की पीड़ा 
छटपटाऊँ

सरल नहीं
लिख पाना कुछ भी

हाल बेहाल

देखा जो मैंने
मैना जब चहकी

मन बहला

माँ ने भी देखा
ठंडी सी आह भरी

नैनों में नीर

पंछी से सीखो
कर्म करो अपना
मोह न जानो

उड़ जाते हैं
चींचीं करते बच्चे

पाते ही पंख 

यादों के साए
खुश्बू बनके छाएँ

इच्छा सबल 

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