Tuesday, July 15, 2014

संघर्षरत जिएँ (8)


प्रेम सत्य है
रूप रंग सुगन्ध
त्रिपदम सा


निशा स्तब्ध थी
सागर सम्मोहित
लहरें गातीं

धरा ठिठकी
लहरों में उद्वेग
चंदा निहारे

सुर कन्या सी
आलिंगनबद्ध थीं
लहरें प्यारी


रेतीला मन
फिसलते कदम
दिशाहीनता

शीत बसंती
बदलती ऋतुएँ
झरता ताप

गरजे मेघ
दामिनी दमकती
सूरज भागा

        जीवन-चक्र         
संघर्षरत जिएँ
आत्म-शक्ति हो

No comments:

Post a Comment