लो आया ग्रीष्म
जला, तपा भभका
सन्नाटा छाया
बरसे आग
जले धरा की देह
दहका सूरज
लू का थपेड़ा
थप्पड़ सा लगता
बेहोशी छाती
प्यास बुझे न
जल है प्रेम बूँद
तरसे मन
खुश्क से पत्ते
पैरों तले चीखते
मिटे पल में