डरा कपोत
बिल्ली टोह में बैठी
जीतेगा एक
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सोचा मैंने भी
खामोश हूँ क्यों
बैठी जड़ सी
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क्या मैं ऐसी हूँ
तटस्थ या नादान
भावुक जीव
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पंछी आज़ाद
आँख कान थे बंद
ध्यान मग्न था
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मैं-मैं या म्याऊँ
करते प्राणी सब
कौन मूर्ख
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सभी निराले
गुण औगुण संग
स्वीकारा मैंने