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Tuesday, July 15, 2014

गुण औगुण संग (6)




डरा कपोत
बिल्ली टोह में बैठी
जीतेगा एक 
**
सोचा मैंने भी
खामोश हूँ क्यों
बैठी जड़ सी
**
क्या मैं ऐसी हूँ
तटस्थ या नादान
भावुक जीव
**
पंछी आज़ाद
आँख कान थे बंद
ध्यान मग्न था
**
मैं-मैं या म्याऊँ
करते प्राणी सब
कौन मूर्ख
**
सभी निराले
गुण औगुण संग
स्वीकारा मैंने

हाइकु समूह के लिए (6)


धरा की माँग
झिलमिलाता व्योम 
चाँदी बिखरी


कर कस्तूरी
सखी बन महकी 
सूँघें हिरणी
    या 
नन्हीं के हाथ
कस्तूरी महकती
ढूँढता मृग 

झरता स्नेह
तृप्त धरा आकाश
माया मोहती 

स्वर्ग का झूला
माँ का आँचल न्यारा
झूलता लाल 

बच्चों का मोह
माँ छिपाती डैनों में
जग निष्ठुर 


Wednesday, December 26, 2012

मन-पंछी आकुल (2)


दम घुटता
तोड़ दे पिंजरे को
मन विकल


कल न पड़े
मन-पंछी आकुल
उड़ना चाहे