Tuesday, July 15, 2014

ममता माँ की


उंगलियाँ रचेगीं (3)




चंचल  नैन
हर पल उड़ते हैं
पलकें पंख 

गुलाबी होंठ 
आज़ादी के नग़में
सुरीले सुर

खुतकार सी
उंगलियाँ रचेंगी
तस्वीर नई

(खुतकार=पेंसिल)

धूल है नकचढ़ी (6)


प्याला हो जैसे
रेत में डूबा रवि
आधा भरा सा

धूल के कण
पत्तों पर पसरे 
चमकीले से 

सिर चढ़ती
धूल है नकचढ़ी
चिड़चिड़ी सी  

धूल ही धूल 
हवा तूफ़ानी तेज़
दम घुटता

धूसर पेड़ 
धूल भरी शाखाएँ
पत्तों पे गर्द 

नभ ने ओढ़ा
धरती का आँचल 
मटमैला सा 

स्मृति-दंश (5)




ख़ाली आँखें
रेगिस्तान अपार
वीरानापन

पीछा करते
सपनों के हैं साए
छूना है बस

स्वप्न सलोना
पा लूँगी इक दिन
विश्वास भरा

खुश्बू प्यार की
महकते हैं प्राण
खिला जीवन

स्वर्णिम पल
मिलन अलौकिक
स्मृति-दंश

स्वेद सुरा को चख (2)


छाया रहस्य
धूल से आच्छादित

मौन हैं बुत



साकी सोया सा

स्वेद सुरा को चख

मद की मस्ती 

जीवन धुआँ



जीवन धुआँ 
साँसो को पीते जाते

उड़ती उम्र

बादल छल्ले



हुक्का आकाश 
कश खींचे धरती 

बादल छल्ले