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Sunday, May 15, 2016

प्यार की डली - माँ (2)



मीठी -सी माँ है
लोरी मिश्री सी घुली
प्यार की डली 
*********
माँ की बिटिया
प्यार दुलार पाया
सबल हुई । 


Tuesday, July 15, 2014

ममता माँ की


हाइकु समूह के लिए (6)


धरा की माँग
झिलमिलाता व्योम 
चाँदी बिखरी


कर कस्तूरी
सखी बन महकी 
सूँघें हिरणी
    या 
नन्हीं के हाथ
कस्तूरी महकती
ढूँढता मृग 

झरता स्नेह
तृप्त धरा आकाश
माया मोहती 

स्वर्ग का झूला
माँ का आँचल न्यारा
झूलता लाल 

बच्चों का मोह
माँ छिपाती डैनों में
जग निष्ठुर 


Sunday, June 22, 2014

माँ का स्नेहिल साया (3)


 हवा गर्म है
माँ का स्नेहिल साया

शीतल छाया

भूली मातृत्त्व

माँ की ममता पाई
बस बेटी हूँ 


आज मैं लौटी

फिर से माँ बनके
प्यार लुटाती

निपट अकेली वो (माँ) 13



कैसे लिखूँ मैं
बुद्धि जड़ हो गई

मन बोझिल

सोचा था मैंने
सफ़रनामा न्यारा

दर्ज करूँगी

लेखनी रुकी
थम गए हैं शब्द

गला रुँधा है


कविता हो न

लेख लिख न पाऊँ
बात बने न



अर्धांग रूठा

निपट अकेली वो 
दर्द गहरा


साथी जो छूटा
मन-पंछी व्याकुल

रोता ही जाए

समझूँ कैसे
अंतर्मन की पीड़ा 
छटपटाऊँ

सरल नहीं
लिख पाना कुछ भी

हाल बेहाल

देखा जो मैंने
मैना जब चहकी

मन बहला

माँ ने भी देखा
ठंडी सी आह भरी

नैनों में नीर

पंछी से सीखो
कर्म करो अपना
मोह न जानो

उड़ जाते हैं
चींचीं करते बच्चे

पाते ही पंख 

यादों के साए
खुश्बू बनके छाएँ

इच्छा सबल