Tuesday, July 15, 2014

शब्द भेदते (2)



बात औ' भात 
जीभ के वशीभूत 
विष वमन 


शब्द भेदते

तीर बन चुभते
भाव मरते

Sunday, June 22, 2014

मौत अंगूरी न्यारी (2)




साकी सा यम
मौत अंगूरी न्यारी
रूप खिलेगा/नशा चढ़ेगा/मोक्ष मिलेगा

मुत्यु प्रिया सी
इक दिन आएगी
गले लगाओ

कोहरा गूँगा (2)




वीरान पथ
निपट अकेली मैं
कोहरा गूँगा 

नीले सपने
रजनी भेदभरी
 सोई है धरा 


माँ का स्नेहिल साया (3)


 हवा गर्म है
माँ का स्नेहिल साया

शीतल छाया

भूली मातृत्त्व

माँ की ममता पाई
बस बेटी हूँ 


आज मैं लौटी

फिर से माँ बनके
प्यार लुटाती

लिखूँ पढूँ इच्छा से (4)


ब्लॉग जगत
परिवार सा प्यारा

है अनमोल 

पढ़ना भाए

लिखना भूली जैसे
अनोखी माया



दिल्ली सफ़र

दर्ज करूँगी फिर
मनमर्जी से


मनमौजी मैं

लिखूँ पढूँ इच्छा से
मदमस्ती में

निपट अकेली वो (माँ) 13



कैसे लिखूँ मैं
बुद्धि जड़ हो गई

मन बोझिल

सोचा था मैंने
सफ़रनामा न्यारा

दर्ज करूँगी

लेखनी रुकी
थम गए हैं शब्द

गला रुँधा है


कविता हो न

लेख लिख न पाऊँ
बात बने न



अर्धांग रूठा

निपट अकेली वो 
दर्द गहरा


साथी जो छूटा
मन-पंछी व्याकुल

रोता ही जाए

समझूँ कैसे
अंतर्मन की पीड़ा 
छटपटाऊँ

सरल नहीं
लिख पाना कुछ भी

हाल बेहाल

देखा जो मैंने
मैना जब चहकी

मन बहला

माँ ने भी देखा
ठंडी सी आह भरी

नैनों में नीर

पंछी से सीखो
कर्म करो अपना
मोह न जानो

उड़ जाते हैं
चींचीं करते बच्चे

पाते ही पंख 

यादों के साए
खुश्बू बनके छाएँ

इच्छा सबल 

मधुशाला का साक़ी (2)


मन मोहता
मधुशाला का साकी

बहके पग

गहरा नशा

डगमग पग हैं 
बेसुध मन