Tuesday, July 15, 2014

मॉल देहरान का (6)


देखा हमने
मॉल देहरान का
नया नवेला



बुर्के में बंद
ख्वाहिशे हैं हज़ार
पूरी हों अब



 सला का वक्त
पर्दे में गपशप
दुकाने बंद




दोस्त मिले दो
दम लेने को बैठे
कॉफी थे पीते






 फैलती खुश्बू

सिनामन के रोल्ज़

मुँह में पानी





पल दो पल

बातों में मशगूल

पिता औ' पुत्र


ऋतु गर्मी की आई (5)



लू सी जलती
ऋतु गर्मी की आई
धू धू करती
*
किरणें तीली
सूरज की माचिस
धरा सुलगी
*
सड़कें काली
तपती रेत जले
खुश्क हवाएँ
*
दम घुटता
धूल में घर डूबा
दीवारें रोतीं
*
रेतीला साया
दबी चहुँ दिशाएँ
घुटी हवाएँ

गुण औगुण संग (6)




डरा कपोत
बिल्ली टोह में बैठी
जीतेगा एक 
**
सोचा मैंने भी
खामोश हूँ क्यों
बैठी जड़ सी
**
क्या मैं ऐसी हूँ
तटस्थ या नादान
भावुक जीव
**
पंछी आज़ाद
आँख कान थे बंद
ध्यान मग्न था
**
मैं-मैं या म्याऊँ
करते प्राणी सब
कौन मूर्ख
**
सभी निराले
गुण औगुण संग
स्वीकारा मैंने

ममता माँ की


उंगलियाँ रचेगीं (3)




चंचल  नैन
हर पल उड़ते हैं
पलकें पंख 

गुलाबी होंठ 
आज़ादी के नग़में
सुरीले सुर

खुतकार सी
उंगलियाँ रचेंगी
तस्वीर नई

(खुतकार=पेंसिल)

धूल है नकचढ़ी (6)


प्याला हो जैसे
रेत में डूबा रवि
आधा भरा सा

धूल के कण
पत्तों पर पसरे 
चमकीले से 

सिर चढ़ती
धूल है नकचढ़ी
चिड़चिड़ी सी  

धूल ही धूल 
हवा तूफ़ानी तेज़
दम घुटता

धूसर पेड़ 
धूल भरी शाखाएँ
पत्तों पे गर्द 

नभ ने ओढ़ा
धरती का आँचल 
मटमैला सा 

स्मृति-दंश (5)




ख़ाली आँखें
रेगिस्तान अपार
वीरानापन

पीछा करते
सपनों के हैं साए
छूना है बस

स्वप्न सलोना
पा लूँगी इक दिन
विश्वास भरा

खुश्बू प्यार की
महकते हैं प्राण
खिला जीवन

स्वर्णिम पल
मिलन अलौकिक
स्मृति-दंश