Wednesday, December 26, 2012

मन हर्षाया


मन हर्षाया
नभ के नैना भीगे

छाया  उल्लास 






प्रकृति की नायिका (कविता) 3


त्रिपदम (हाइकु) नामकरण मन भाया
मन मेरा अति हर्षाया

सकूरा जैसी मन-भावन सुन्दरता लेके,

जन्म लें त्रिपदम हर दिन मन में आया



त्रिपदम मेरे पढ़ने होंगे गहराई में जाकर
प्रफुल्लित होगा मन मेरा प्रशंसा आपकी पाकर



भोर सुहानी

प्रकृति की नायिका

रवि मुस्काया
* * *
कुछ कहतीं
लहरें पुकारती
रहस्यमयी
* * *
जलधि जल
पानी का कटोरा है
छलका जाए

प्रकृति संग (कविता) 5



प्रकृति संग
चिंतन में डूबता
अकेला मन
* * * *
स्वर्णमयी है
धरा के हस्त धरा
कनक धन
* * * *
क्षितिज दूर
गगन धरा जुड़ें
दिवा स्वप्न है
* * * *
झीना आँचल
धूल धूसरित सा
धुँधला रूप
* * * *
फटा दामन
सूरज निकलता
हाथों से छूटा

मुक्ति की चाह (कविता) 3


1

मन भटका
जंगली सोचें जन्मी
राह मिले न

2
खोजे मानव
दानव छिपा हुआ
देव दिखे न

3

बँधी सीमाएँ
साँसें घुटती जाती
मुक्ति की चाह


सोच के फूल खिलें (कविता) 3

 1
क्षमा चाहिए 
त्वरित वेग था वो
बाँध लिया है 


2
होती गलती
सुधार भी संभव
आधार यही


3
नित नवीन
सोच के फूल खिलें
महकें बस

ऋतु मन की


ऋतु मन की 
ताप-तप्त अतृप्त 
क्षुधा असीम 


भाव है मुख्य


शब्दों की कमी
समझ लेंगे सब 
भाव है मुख्य