ब्लॉग जगत
परिवार सा प्यारा
है अनमोल
पढ़ना भाए
लिखना भूली जैसे
अनोखी माया
दिल्ली सफ़र
दर्ज करूँगी फिर
मनमर्जी से
मनमौजी मैं
लिखूँ पढूँ इच्छा से
मदमस्ती में
कैसे लिखूँ मैं
बुद्धि जड़ हो गई
मन बोझिल
सोचा था मैंने
सफ़रनामा न्यारा
दर्ज करूँगी
लेखनी रुकी
थम गए हैं शब्द
गला रुँधा है
कविता हो न
लेख लिख न पाऊँ
बात बने न
अर्धांग रूठा
निपट अकेली वो
दर्द गहरा
साथी जो छूटा
मन-पंछी व्याकुल
रोता ही जाए
समझूँ कैसे
अंतर्मन की पीड़ा
छटपटाऊँ
सरल नहीं
लिख पाना कुछ भी
हाल बेहाल
देखा जो मैंने
मैना जब चहकी
मन बहला
माँ ने भी देखा
ठंडी सी आह भरी
नैनों में नीर
पंछी से सीखो
कर्म करो अपना
मोह न जानो
उड़ जाते हैं
चींचीं करते बच्चे
पाते ही पंख
यादों के साए
खुश्बू बनके छाएँ
इच्छा सबल
मन मोहता
मधुशाला का साकी
बहके पग
गहरा नशा
डगमग पग हैं
बेसुध मन
चिट्ठा चित्तेरा
पुकारे बार-बार
लौटी फिर से
कलम चली
शब्दों को पंख लगे
उड़ते भाव
वसुधा सोचे
खिलने की चाह है
शांति मिलेगी
सुमन खिले
हरयाली उमगी
फैली सुगंध
मैं मैं नहीं हूँ
जो हूँ वैसी नहीं हूँ
भ्रमित मन
छलिया है जो
पाखंड करता क्यों
नादान मन
प्रशंसा पाए
अहम ही ब्रह्रास्मि
तृप्त हो जाए
मोह पाश है
विश्व मकड़ी जाल
नहीं उलझो
सत्य का खोजी
प्रकाश स्वयं बन
तू ही आनन्दी
दिल को छू ले
बात-बात का फ़र्क
बुद्धि उलझे
शुष्क नीरस
प्रेम-पुष्प विहीन
मानव मन
मृग-तृष्णा है
मन मरुस्थल सा
प्रेम का सोता
प्रेमी का मन
आनन्द का झरना
रस झरता