धुँध औ' धुआँ
गहराता दिल में
सहमीं
साँसें
धुँधली यादें
दर्पण की चाह में
तिलमिलातीं
खिलता फूल
महकी सारी सृष्टि
सूरज उगा
मीठी -सी माँ है
लोरी मिश्री सी घुली
प्यार की डली
माँ की बिटिया
प्यार दुलार पाया
सबल हुई ।
प्रेम सत्य है
रूप रंग सुगन्ध
त्रिपदम सा
निशा स्तब्ध थी
सागर सम्मोहित
लहरें गातीं
लहरों में उद्वेग
आलिंगनबद्ध थीं
लहरें प्यारी
फिसलते कदम
बदलती ऋतुएँ
दामिनी दमकती
सूरज भागा
कॉफी का प्याला
कागज़ कलम है
शब्दों की झाग
प्राण फूँकते
जादू से भरे हाथ
संजीवनी से
सलोना नभ
सुरमई मेघ हैं
साँवली घटा
तूफानी रात
तड़ित दामिनी सी
भयभीत मैं
क्यों मैं ही मैं हूँ
गर्व किस बात का
नासमझी क्यों
अहम त्यागो
अमर तुम नहीं
मृत्यु निश्चित
घना अंधेरा
छाया का साया नहीं
अविश्वास है
मृत्यु मित्र सी
चुपके से आती है
गले लगाती
यायावरी है
आना-जाना लोगों का
थके न कोई