चिट्ठा चित्तेरा
पुकारे बार-बार
लौटी फिर से
कलम चली
शब्दों को पंख लगे
उड़ते भाव
वसुधा सोचे
खिलने की चाह है
शांति मिलेगी
सुमन खिले
हरयाली उमगी
फैली सुगंध
मैं मैं नहीं हूँ
जो हूँ वैसी नहीं हूँ
भ्रमित मन
छलिया है जो
पाखंड करता क्यों
नादान मन
प्रशंसा पाए
अहम ही ब्रह्रास्मि
तृप्त हो जाए
मोह पाश है
विश्व मकड़ी जाल
नहीं उलझो
सत्य का खोजी
प्रकाश स्वयं बन
तू ही आनन्दी
दिल को छू ले
बात-बात का फ़र्क
बुद्धि उलझे
शुष्क नीरस
प्रेम-पुष्प विहीन
मानव मन
मृग-तृष्णा है
मन मरुस्थल सा
प्रेम का सोता
प्रेमी का मन
आनन्द का झरना
रस झरता
पदम तले
त्रिपदम पले हैं
सुगन्ध भरे
नवयौवना
गुलानारी रूपसी
नई नवेली
न्यारा है रूप
चित्रकला अनोखी
रंगों की माया
बिन्दु चक्र में
सम्मोहन की छाया
भरा रहस्य
बाँहें फैलाए
धरा खड़ी निहारे
नीला आकाश
मैं और तुम
उपवन के माली
फूल खिले हैं
स्नेह के धागे
पीले केसर जैसे
अति सुन्दर
काँटो का संगी
गुलाब नाज़ुक सा
गुलों का गुल
धरा सजी है
लाल पीले रंग से
पत्ते मुस्काए
गुलाबी गोरी
प्रहरी तने हुए
नाता गहरा
हरा कालीन
टंके हैं बेल-बूटे
बेमोल कला
गुलाबी बाँहें
नभ को छूना चाहें
हँसी दिशाएँ
दहका रवि
हो गए लाल पीले
खिलते फूल
दृढ़-निश्चयी
जीने का लक्ष्य पाएँ
ठान लो बस
रंग रंगीला
महकता जीवन
कण्टकहीन
खिलेगे फूल
1
देखूँ खिड़की से मैं
माया मोहिनी
उतरी बर्फ़
कुतरी रुई जैसी
धरा लिहाफ़
4
जुड़ा डाली से
जड़ों से जुड़े
अटल औ' अडिग
वृक्ष महान
ऊर्जा का स्त्रोत
मेरा पुस्तक-प्रेम
भाव नवीन