Thursday, June 13, 2013

त्रिपदम पले हैं फूलों में (16)



 पदम तले
त्रिपदम पले हैं

सुगन्ध भरे




नवयौवना
गुलानारी रूपसी

नई नवेली






न्यारा है रूप
चित्रकला अनोखी

रंगों की माया




बिन्दु चक्र में
सम्मोहन की छाया

भरा रहस्य




बाँहें फैलाए
धरा खड़ी निहारे

नीला आकाश





मैं और तुम
उपवन के माली

फूल खिले हैं





स्नेह के धागे
पीले केसर जैसे

अति सुन्दर





 काँटो का संगी
गुलाब नाज़ुक सा

गुलों का गुल




 धरा सजी है
लाल पीले रंग से 

पत्ते मुस्काए


 गुलाबी गोरी
प्रहरी तने हुए

नाता गहरा




हरा कालीन
टंके हैं बेल-बूटे
बेमोल कला





गुलाबी बाँहें
नभ को छूना चाहें
हँसी दिशाएँ





दहका रवि
हो गए लाल पीले

खिलते फूल





 दृढ़-निश्चयी
जीने का लक्ष्य पाएँ

ठान लो बस


 रंग रंगीला
महकता जीवन

कण्टकहीन




धुंधले साए
छटेंगे इक दिन
खिलेगे फूल


क्रेनबेरी लेन से ---- (6)

1

अकेली खड़ी 

देखूँ खिड़की से मैं

माया  मोहिनी 

2

कजरा मेघ

नभ के नैना सोहें 

भूमि को भाएँ 

3

उतरी बर्फ़ 

कुतरी रुई जैसी

धरा लिहाफ़

4


निर्वस्त्र खड़े

साधनारत वृक्ष 

अघोरी लगें 

5

एक ही पत्ता

जकड़ा है मोह में 

जुड़ा डाली से 

6

जड़ों से जुड़े 

अटल औ' अडिग 

वृक्ष महान 

ऊर्जा का स्त्रोत

ऊर्जा का स्त्रोत 
मेरा पुस्तक-प्रेम 
भाव नवीन 

Wednesday, December 26, 2012

मन हर्षाया


मन हर्षाया
नभ के नैना भीगे

छाया  उल्लास 






प्रकृति की नायिका (कविता) 3


त्रिपदम (हाइकु) नामकरण मन भाया
मन मेरा अति हर्षाया

सकूरा जैसी मन-भावन सुन्दरता लेके,

जन्म लें त्रिपदम हर दिन मन में आया



त्रिपदम मेरे पढ़ने होंगे गहराई में जाकर
प्रफुल्लित होगा मन मेरा प्रशंसा आपकी पाकर



भोर सुहानी

प्रकृति की नायिका

रवि मुस्काया
* * *
कुछ कहतीं
लहरें पुकारती
रहस्यमयी
* * *
जलधि जल
पानी का कटोरा है
छलका जाए

प्रकृति संग (कविता) 5



प्रकृति संग
चिंतन में डूबता
अकेला मन
* * * *
स्वर्णमयी है
धरा के हस्त धरा
कनक धन
* * * *
क्षितिज दूर
गगन धरा जुड़ें
दिवा स्वप्न है
* * * *
झीना आँचल
धूल धूसरित सा
धुँधला रूप
* * * *
फटा दामन
सूरज निकलता
हाथों से छूटा

मुक्ति की चाह (कविता) 3


1

मन भटका
जंगली सोचें जन्मी
राह मिले न

2
खोजे मानव
दानव छिपा हुआ
देव दिखे न

3

बँधी सीमाएँ
साँसें घुटती जाती
मुक्ति की चाह