Thursday, February 26, 2026

रेतीला गलियारा (हाइकु)


धुंधलापन 

खोई याद्दाश्त 

विवश मन 


आवारा मन 

बेलगाम हैं घोड़े 

सोच तूफ़ानी 


बंजारा दिल

उमड़ते काफिले 

अंधी गलियां 


धूसर पथ

रेतीला गलियारा 

कुछ ना सूझे

 

मलाई या रजाई सी बर्फ़ (Toronto Diary)

 

बर्फ़ की तहें 

सफ़ेद लिहाफ सी 

सिकती धरा 


धरा ने धारी

दूध की मलाई सी 

बर्फ़ ही बर्फ़  


माटी में लोटती 

सांवली सलोनी सी 

बेरंग बर्फ़


बर्फ़ के टीले 

तरल कभी ठोस 

हवा बर्फीली 


गिरती बर्फ़

पेड़ हुए कंकाल 

पाले के मारे


मीनाक्षी धनवंतरि 

Monday, December 11, 2023

नामकरण

हाइकु जापान की सबसे छोटी कविता है 

चित्रों पर आधारित हाइकु हाईगा कहलाते हैं 

हाइकु के साथ एक छोटी सी घटना हाईबन कहलाती है 

जिन्हें मैंने हिंदी में नए नाम दिए हैं 

हाइकु  त्रिपदम

हाइगा  चित्रपदम

हाइबन कथा

पदम 



Friday, January 27, 2017

धुँध औ' धुआँ

धुँध औ' धुआँ  
गहराता दिल में  
सहमीं  साँसें


 धुँधली यादें  
 दर्पण की चाह में  
 तिलमिलातीं 

Tuesday, May 17, 2016

Sunday, May 15, 2016

प्यार की डली - माँ (2)



मीठी -सी माँ है
लोरी मिश्री सी घुली
प्यार की डली 
*********
माँ की बिटिया
प्यार दुलार पाया
सबल हुई । 


Tuesday, July 15, 2014

संघर्षरत जिएँ (8)


प्रेम सत्य है
रूप रंग सुगन्ध
त्रिपदम सा


निशा स्तब्ध थी
सागर सम्मोहित
लहरें गातीं

धरा ठिठकी
लहरों में उद्वेग
चंदा निहारे

सुर कन्या सी
आलिंगनबद्ध थीं
लहरें प्यारी


रेतीला मन
फिसलते कदम
दिशाहीनता

शीत बसंती
बदलती ऋतुएँ
झरता ताप

गरजे मेघ
दामिनी दमकती
सूरज भागा

        जीवन-चक्र         
संघर्षरत जिएँ
आत्म-शक्ति हो

जादू से भरे हाथ (2)


कॉफी का प्याला

कागज़ कलम है
शब्दों की झाग



प्राण फूँकते
जादू से भरे हाथ
संजीवनी से



सुरमई मेघ हैं (2)

सलोना नभ
सुरमई मेघ हैं
साँवली घटा
तूफानी रात
तड़ित दामिनी सी
भयभीत मैं

गर्व किस बात का (5)


क्यों मैं ही मैं हूँ

गर्व किस बात का
नासमझी क्यों


अहम त्यागो
अमर तुम नहीं
मृत्यु निश्चित


घना अंधेरा
छाया का साया नहीं
अविश्वास है


मृत्यु मित्र सी
चुपके से आती है
गले लगाती


यायावरी है
आना-जाना लोगों का
थके न कोई

अक्स में दिल मेरा (9)


 
गौर से देखो
अक्स में दिल मेरा
देश में छोड़ा





इतने एसी
कितना प्रदूषण
दिल धड़का





राह चलते
किताबें खरीदीं थी
सस्ती दो तीन





ध्यान में लीन
कबूतर सोच में

मन मोहता




गहरा कुँआ
जल-जीवन भरा

मन भी वैसा




प्यारे बालक
देश-प्रेम दर्शाएँ
रिपब्लिक डे





रस्ता देखूँ मैं
कोई मीत मिलेगा
आशा थी बस




देखे किसको
कागा पीठ दिखाए
गीत सुनाए




 मीत को पाया
वट-वृक्ष का साया

मन भरमाया


(photos clicked by me from hotel window in Mumbai) 



मौन की भाषा पढ़ो (2)

मौन हुई मैं
स्नेह करे निशब्द
भाव गहरे
शब्द न पाऊँ
मौन की भाषा पढ़ो
आभारी हूँ मैं

साया मन को भाया (3)



सपना आया

साया मन को भाया
स्नेह की छाया



खड़ी मुस्काये
आज नहीं तो कल
पाना तुझको



विश्वास मुझे 
जन्मों जन्मों का नाता
मिलना ही है

जल बिन मानव (2)





जीवन जले

जल बिन मानव
कैसे जिएगा ?







बहता जल

जल से जीवन है
कीमत जानो


आग़ोश में सुक़ून






सिहरी काँपीं
आगोश मे सकून
सूरज तापे



(दमाम में 8-10 क्लिक करने के बाद ही मेरी मन-चाही मन-भावन तस्वीर उतर पाई)

लो आया ग्रीष्म (5)


लो आया ग्रीष्म

जला, तपा भभका
सन्नाटा छाया



बरसे आग
जले धरा की देह
दहका सूरज



लू का थपेड़ा
थप्पड़ सा लगता
बेहोशी छाती



प्यास बुझे न
जल है प्रेम बूँद
तरसे मन



खुश्क से पत्ते
पैरों तले चीखते
मिटे पल में

मॉल देहरान का (6)


देखा हमने
मॉल देहरान का
नया नवेला



बुर्के में बंद
ख्वाहिशे हैं हज़ार
पूरी हों अब



 सला का वक्त
पर्दे में गपशप
दुकाने बंद




दोस्त मिले दो
दम लेने को बैठे
कॉफी थे पीते






 फैलती खुश्बू

सिनामन के रोल्ज़

मुँह में पानी





पल दो पल

बातों में मशगूल

पिता औ' पुत्र


ऋतु गर्मी की आई (5)



लू सी जलती
ऋतु गर्मी की आई
धू धू करती
*
किरणें तीली
सूरज की माचिस
धरा सुलगी
*
सड़कें काली
तपती रेत जले
खुश्क हवाएँ
*
दम घुटता
धूल में घर डूबा
दीवारें रोतीं
*
रेतीला साया
दबी चहुँ दिशाएँ
घुटी हवाएँ

गुण औगुण संग (6)




डरा कपोत
बिल्ली टोह में बैठी
जीतेगा एक 
**
सोचा मैंने भी
खामोश हूँ क्यों
बैठी जड़ सी
**
क्या मैं ऐसी हूँ
तटस्थ या नादान
भावुक जीव
**
पंछी आज़ाद
आँख कान थे बंद
ध्यान मग्न था
**
मैं-मैं या म्याऊँ
करते प्राणी सब
कौन मूर्ख
**
सभी निराले
गुण औगुण संग
स्वीकारा मैंने

ममता माँ की